​रायपुर : शिक्षित किसान सोनूराम ने जैविक खेती से गढ़ी सफलता की नई इबारत

PTV BHARAT 10 JULY 2026 रायपुर : शिक्षित किसान सोनूराम ने जैविक खेती से गढ़ी सफलता की नई इबारत – कहावत है कि जहाँ चाह होती है, वहाँ राह अपने आप बन जाती है। इसे सच कर दिखाया है कांकेर जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्र और कभी माओवाद से प्रभावित रहे आमाबेड़ा तहसील के ग्राम चिचगांव के प्रगतिशील किसान सोनूराम ध्रुव ने। उच्च शिक्षित होने के बावजूद नौकरी की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय उन्होंने अपनी माटी की सेवा करने का संकल्प लिया। आज वे अपनी वैज्ञानिक सोच, दृढ़ संकल्प और सरकारी योजनाओं के समन्वय से क्षेत्र के किसानों के लिए एक बड़े प्रेरणास्रोत बन गए हैं।

उच्च शिक्षा के बाद चुना खेती का मार्ग

सोनूराम ध्रुव ने अर्थशास्त्र विषय में स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त की है। अपनी इस शिक्षा का उपयोग उन्होंने नौकरी ढूंढने में नहीं, बल्कि खेती की अर्थव्यवस्था को सुधारने में किया। उनके पास लगभग 10 एकड़ कृषि भूमि है। उन्होंने परंपरागत खेती के ढर्रे को छोड़कर आधुनिक तकनीक और जैविक पद्धतियों को अपनाया, जिससे आज वे एक आत्मनिर्भर और सफल कृषक के रूप में स्थापित हो चुके हैं।

वर्ष 2015 से शुरू हुआ सफर, अब हैं ‘प्रमाणित’ किसान

सोनूराम ने करीब 11 वर्ष पहले, यानी वर्ष 2015 में जैविक खेती की शुरुआत की थी। शुरुआत में मुश्किलें आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी मेहनत के दम पर आज वे राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के अंतर्गत एक प्रमाणित किसान हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ प्रमाणीकरण समिति (CGOCERT) तथा भारत वानिकी एवं कृषि द्वारा बाकायदा निरीक्षण के बाद जैविक खेती का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया है।

‘ड्रिप इरिगेशन’ और एकीकृत कृषि से बढ़ी आय

सोनूराम अपने 10 एकड़ के खेत में समन्वित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System) अपनाते हैं, जिसके तहत वे विविध प्रकार की फसलें लेते हैं:

जैविक चिन्नौर व काला धान (ब्लैक राइस): करीब 4 एकड़ में वे शत-प्रतिशत जैविक सुगंधित चिन्नौर धान और औषधीय गुणों से भरपूर काला धान उगाते हैं।

मसाला और नकदी फसलें: इस वर्ष उन्होंने अपने खेत में काली मिर्च के 400 पौधे लगाए हैं, जिनमें फल आने शुरू हो गए हैं। इसके अलावा वे गेहूं, उड़द, कुल्थी, रागी और औषधीय काली हल्दी की भी खेती कर रहे हैं।

गौ-पालन और बागवानी: फसलों के साथ-साथ वे आम की बागवानी और गौ-पालन भी करते हैं, जिससे खेत के लिए जरूरी खाद आसानी से मिल जाती है।

आधुनिक जल प्रबंधन: उन्होंने अपने खेतों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली (टपक सिंचाई) अपनाई है, जिससे कम पानी में भी फसलों का भरपूर और बेहतर उत्पादन हो रहा है।

वृक्ष आयुर्वेद और ‘पंचमहाभूत’ का संतुलन

सोनूराम अपनी खेती में ताराचंद बेलजी तकनीक का उपयोग करते हैं, जो वृक्ष आयुर्वेद आधारित प्राकृतिक खेती पर केंद्रित है। यह पद्धति पंचमहाभूत (भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल) के सिद्धांतों पर काम करती है। उनका मानना है कि प्रकृति के तत्वों के साथ संतुलन बनाकर खेती करने से न केवल मिट्टी की सेहत सुधरती है, बल्कि फसलें भी अधिक पौष्टिक और उच्च गुणवत्ता वाली होती हैं।

घर पर ही तैयार करते हैं खाद और कीटनाशक

सोनूराम बाजार की महंगी रासायनिक खादों पर निर्भर नहीं हैं। वे अपने खेत और आसपास उपलब्ध स्थानीय संसाधनों जैसे नींबू, पपीता, हर्रा और अन्य वनस्पतियों से स्वयं ही जैविक घोल, जीवामृत तथा जैविक कीटनाशक तैयार करते हैं। इससे उनकी खेती की लागत (Input Cost) बेहद कम हो गई है।

मिट्टी की सेहत सुधारी, अब 150 रुपए किलो बिकता है चावल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “खर्च कम करें और लाभ बढ़ाएं” के आह्वान और जैविक खेती को बढ़ावा देने के संदेश से सोनूराम को बड़ी प्रेरणा मिली।

सॉइल हेल्थ कार्ड और मिट्टी सुधार: मिट्टी की जांच में कार्बन की मात्रा कम पाए जाने पर सोनूराम ने खेत में तिल की खेती शुरू की। फसल कटने के बाद वे उसके अवशेषों को मिट्टी में ही मिला देते हैं, जिससे भूमि का जैविक कार्बन और पीएच (pH) स्तर संतुलित हो रहा है।

शानदार उत्पादन और मुनाफा: खरीफ सीजन में वे प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल धान का उत्पादन लेते हैं। उनका शत-प्रतिशत जैविक चिन्नौर चावल बाजार में 150 रुपए प्रति किलोग्राम तक की ऊंची कीमत पर बिकता है।

सालाना आय: इन सभी कृषि गतिविधियों और पूरे परिवार के सक्रिय सहयोग से सोनूराम को हर साल 8 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय हो रही है।

वनांचल के किसानों के लिए रोल मॉडल

कभी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझने वाले सुदूर चिचगांव के सोनूराम ध्रुव ने यह साबित कर दिया है कि यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शासकीय योजनाओं का लाभ और पारंपरिक ज्ञान का सही तालमेल हो, तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी समृद्धि के द्वार खोले जा सकते हैं। आज वे अपने क्षेत्र के दर्जनों अन्य किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *