PTV BHARAT 22 JULY 2026 नारायणपुर : पर्यावरण पर विशेष लेख : अबूझमाड़ से राष्ट्रीय मंच तक पर्यावरण संरक्षण के जनआंदोलन ने रची नई पहचान – जब समाज का प्रत्येक नागरिक एक पौधे को केवल हरियाली नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का संकल्प मानकर रोपित करता है, तब पर्यावरण संरक्षण एक अभियान नहीं, बल्कि जनआंदोलन बन जाता है। यही जनआंदोलन किसी क्षेत्र की पहचान बदलने और उसे राष्ट्रीय सम्मान दिलाने की क्षमता रखता है।
अबूझमाड़ की प्रारंभिक परिस्थितियाँ
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का नारायणपुर जिला तथा उसका अबूझमाड़ क्षेत्र लंबे समय तक देश के सबसे दुर्गम, भौगोलिक दृष्टि से कठिन तथा पूर्व में घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। घने वन, ऊँची-नीची पहाड़ियाँ, सीमित संचार सुविधाएँ, कठिन आवागमन, दूरस्थ आदिवासी बस्तियाँ तथा विकास की मुख्यधारा से वर्षों तक दूरी—ये सभी इस क्षेत्र की प्रमुख पहचान रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद उनका वैज्ञानिक एवं सतत उपयोग सीमित था। अनेक गाँवों में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि तथा प्राकृतिक संसाधनों के समुचित प्रबंधन के प्रति व्यापक जनजागरूकता का अभाव था।
जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूमि क्षरण, घटते हरित आवरण, सीमित सिंचाई सुविधाएँ तथा पारंपरिक कृषि पर बढ़ता दबाव ग्रामीण जीवन के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे थे। अनेक स्थानों पर गर्मियों के दौरान जल संकट गहरा जाता था, जबकि कृषि उत्पादन भी प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर था। पर्यावरण संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका था।
ऐसी परिस्थितियों में पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित रखकर स्थायी परिवर्तन लाना संभव नहीं था। आवश्यकता थी ऐसे मॉडल की, जो समाज के प्रत्येक वर्ग को जोड़ सके, स्थानीय समुदायों में स्वामित्व की भावना विकसित करे और पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी के माध्यम से एक सामाजिक आंदोलन का रूप दे। इसी सोच ने लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर में एक ऐसे व्यापक अभियान की नींव रखी, जिसने शिक्षा, विज्ञान, स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक सहभागिता और सतत विकास को एक सूत्र में पिरोते हुए पूरे क्षेत्र में हरित परिवर्तन की नई शुरुआत की।
यहीं से प्रारंभ हुई वह प्रेरक यात्रा, जिसने आगे चलकर नारायणपुर और अबूझमाड़ को पर्यावरण संरक्षण, जनभागीदारी, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान दिलाई तथा जल शक्ति मंत्रालय के ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार-2026’ जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान तक पहुँचाया।
राष्ट्रीय सम्मान के बाद सामाजिक परिवर्तन जनआंदोलन बना जनविश्वास की पहचान
वर्ष 2026 में जल शक्ति मंत्रालय के ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘पर्यावरण चैंपियन पुरस्कार-2026’ प्राप्त होने के बाद इस अभियान ने एक नया अध्याय प्रारंभ किया। यह सम्मान केवल लिंगो मुदियाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर की उपलब्धि नहीं था, बल्कि पूरे नारायणपुर, अबूझमाड़ और छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय बन गया। राष्ट्रीय स्तर पर मिली इस प्रतिष्ठित पहचान ने लोगों के भीतर आत्मविश्वास, गर्व और पर्यावरण संरक्षण के प्रति नई ऊर्जा का संचार किया। जो अभियान अब तक महाविद्यालय और उसके स्वयंसेवकों के नेतृत्व में संचालित हो रहा था, वह धीरे-धीरे समाज के प्रत्येक वर्ग का अपना अभियान बन गया।
ग्रामीण स्वयं पौधे लेने आने लगे
राष्ट्रीय सम्मान के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन लोगों की सोच और व्यवहार में दिखाई दिया। पहले जहाँ पौधारोपण कार्यक्रमों के लिए लोगों को प्रेरित करना पड़ता था, वहीं अब ग्रामीण स्वयं महाविद्यालय पहुँचकर पौधे प्राप्त करने लगे। किसानों, युवाओं, महिलाओं, विद्यार्थियों तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों ने स्वप्रेरणा से अपने गाँवों, खेतों, विद्यालय परिसरों, आंगनबाड़ी केन्द्रों, देवस्थलों, सार्वजनिक स्थलों तथा सड़क किनारों पर वृक्षारोपण प्रारंभ किया।
पौधे लेना केवल एक औपचारिकता नहीं रह गई, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह अपनाने लगा। अनेक ग्रामीणों ने एक पौधा अपने बच्चों के जन्म, विवाह, स्मृति दिवस तथा अन्य सामाजिक अवसरों पर लगाने की परंपरा प्रारंभ की। धीरे-धीरे वृक्षारोपण सामाजिक संस्कार का रूप लेने लगा।
ग्राम पंचायतों की बढ़ी सक्रिय भागीदारी
राष्ट्रीय सम्मान के बाद ग्राम पंचायतों ने भी पर्यावरण संरक्षण को ग्राम विकास की प्राथमिकताओं में शामिल करना प्रारंभ किया। कई पंचायतों ने सामूहिक वृक्षारोपण अभियान आयोजित किए, ग्राम स्तर पर पौधों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारियाँ निर्धारित कीं तथा सार्वजनिक स्थलों को हरित बनाने का संकल्प लिया।
ग्राम सभाओं में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, स्वच्छता, प्राकृतिक खेती तथा जैव विविधता संरक्षण जैसे विषय नियमित चर्चा का हिस्सा बनने लगे। पंचायत प्रतिनिधियों, जनप्रतिनिधियों तथा स्थानीय नेतृत्व ने भी इस अभियान को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई। इससे पर्यावरण संरक्षण सरकारी कार्यक्रम न रहकर स्थानीय स्वशासन और सामुदायिक विकास का अभिन्न अंग बन गया।
जनआंदोलन का हुआ व्यापक विस्तार

