उत्तर बस्तर कांकेर : हरी खाद (ढैंचा) से बदली खेती की तस्वीर, उर्वरक खर्च हुआ आधा और मिट्टी बनी अधिक उपजाऊ

PTV BHARAT 23 JULY 2026 उत्तर बस्तर कांकेर : हरी खाद (ढैंचा) से बदली खेती की तस्वीर, उर्वरक खर्च हुआ आधा और मिट्टी बनी अधिक उपजाऊ – खेती की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वराशक्ति आज किसानों के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे समय में कृषि विभाग के मार्गदर्शन में विकासखंड चारामा के ग्राम गोलकुमड़ा के प्रगतिशील किसान परशुराम साहू ने हरी खाद (ढैंचा) को अपनाकर यह साबित किया है कि प्राकृतिक तरीकों से भी कम लागत में बेहतर खेती की जा सकती है। उनका यह अनुभव क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन रहा है। परशुराम साहू ने करीब तीन वर्ष पहले कृषि विभाग के अधिकारियों के सुझाव पर धान की खेती में ढैंचा का उपयोग शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने प्रयोग के तौर पर इसे अपनाया, लेकिन सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद अब वे नियमित रूप से अपनी लगभग 3 एकड़ कृषि भूमि में धान की रोपाई से 40 से 45 दिन पहले ढैंचा की बुवाई करते हैं।

परशुराम साहू बताते हैं कि ढैंचा की फसल लगभग 35 से 40 दिन में तैयार हो जाती है। इसके बाद ट्रैक्टर या हल की सहायता से इसे खेत में पलटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। कुछ दिनों में यह पूरी तरह विघटित होकर उत्कृष्ट हरी खाद का रूप ले लेती है, जिससे भूमि को प्राकृतिक रूप से आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। वे बताते हैं कि ढैंचा अपनाने के बाद उनके खेत में रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो गई है। पहले जहां अधिक मात्रा में यूरिया एवं अन्य उर्वरकों का उपयोग करना पड़ता था, वहीं अब कम उर्वरक में भी अच्छी फसल मिल रही है। साथ ही उनकी भूमि पहले की तुलना में अधिक भुरभुरी, उपजाऊ और नमी बनाए रखने में सक्षम हो गई है।

विकासखंड चारामा के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी महेश कुमार सोनकर ने बताया कि ढैंचा दलहनी वर्ग की महत्वपूर्ण हरी खाद फसल है। इसकी जड़ों में विकसित होने वाली राइजोबियम जीवाणु ग्रंथियां वायुमंडल से नाइट्रोजन को स्थिर कर मिट्टी में उपलब्ध कराती हैं। एक हेक्टेयर क्षेत्र में तैयार ढैंचा की हरी खाद से भूमि को लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से प्राप्त हो सकती है। इसके साथ ही यह मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाती है, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को प्रोत्साहित करती है, जलधारण क्षमता में सुधार लाती है तथा मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाती है। लगातार उपयोग से भूमि की उर्वराशक्ति लंबे समय तक बनी रहती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।

उन्होंने बताया कि कृषि विभाग द्वारा किसानों को ढैंचा बीज 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती की इस वैज्ञानिक तकनीक को अपनाकर लाभान्वित हो सकें। खरीफ मौसम में धान की रोपाई से पहले ढैंचा की बुवाई कर उसे खेत में पलटने से मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं, जिससे धान की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन क्षमता में भी सकारात्मक वृद्धि होती है। परशुराम साहू का कहना है कि यदि किसान धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर हरी खाद, जैविक खाद तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को अपनाएं, तो खेती अधिक लाभकारी बनने के साथ-साथ मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रखा जा सकता है। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल लागत कम करने का माध्यम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि सुरक्षित रखने का भी प्रभावी उपाय है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *