रायपुर : हरा सोना बना ग्रामीण परिवारों की आर्थिक ताकत

PTV BHARAT 16 JULY 2026 रायपुर : हरा सोना बना ग्रामीण परिवारों की आर्थिक ताकत – छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में तेंदूपत्ता और बांस को ‘हरा सोना’ माना जाता है। तेंदूपत्ता संग्रहण की दर बढ़ाकर 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा किए जाने से लाखों आदिवासी और ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। समय पर भुगतान और बोनस की व्यवस्था से ग्रामीणों का भरोसा भी बढ़ा है तथा तेंदूपत्ता संग्रहण गांवों में रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।

मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के घने वन क्षेत्रों में तेंदूपत्ता केवल एक वनोपज नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए आर्थिक संबल का मजबूत आधार बन चुका है। हर वर्ष गर्मी के मौसम में हजारों ग्रामीण, विशेषकर महिलाएं, तेंदूपत्ता संग्रहण से जुड़कर अपने परिवार की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संग्रहण से प्राप्त राशि का उपयोग बच्चों की शिक्षा, घरेलू आवश्यकताओं और खेती-किसानी में किया जा रहा है।

37 हजार से अधिक परिवारों को मिला 30 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान

वर्ष 2026 में जिले की 39 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियों के अंतर्गत 40 लॉट और 502 फड़ों के माध्यम से तेंदूपत्ता संग्रहण किया गया। मई माह में 37,131 संग्राहक परिवारों ने कुल 55,741.7 मानक बोरा तेंदूपत्ता संग्रहित किया। इसके एवज में उन्हें 30 करोड़ 65 लाख 79 हजार 350 रुपये का भुगतान किया गया। इसके अलावा फरवरी-मार्च 2026 में तेंदूपत्ता बूटा कटाई के लिए 40 लाख 51 हजार 154 रुपये का भुगतान भी किया जा चुका है।

उत्कृष्ट गुणवत्ता से बढ़ी जिले की पहचान

मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले का तेंदूपत्ता अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। इसी कारण यहां के तेंदूपत्ता लॉट की बाजार में अच्छी मांग रहती है और उन्हें बेहतर दरों पर खरीदा जाता है। वर्ष 2023 के तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए जिले की 36 समितियों के 33,363 संग्राहक परिवारों को 11 करोड़ 97 लाख 98 हजार 934 रुपये बोनस के रूप में प्रदान किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

डीबीटी से पारदर्शी और समयबद्ध भुगतान

तेंदूपत्ता संग्रहण और बूटा कटाई का भुगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली के माध्यम से सीधे संग्राहकों के बैंक खातों में किया जा रहा है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और समयबद्ध हुई है। तेंदूपत्ता संग्रहण से मिलने वाली आय ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक संबल बन रही है, वहीं महिलाओं की बढ़ती भागीदारी उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा रही है।

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