27 अगस्त को सुबह 11 बजे से 2100 माताओं-बहनों की उपस्थिति में भगवान श्री जगन्नाथ स्वामी जी को अर्पित किया जाएगा रक्षा-सूत्र

PTV BHARAT 26 AUGUST 2026 रायपुर। रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के पवित्र प्रेम, विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का अनुपम पर्व है। यह केवल कलाई पर राखी बांधने की परंपरा नहीं, बल्कि रिश्तों की गरिमा, पारिवारिक संस्कारों, सामाजिक सद्भाव और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का पवित्र संदेश देने वाला पर्व है। यह बात उत्तर विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक श्री पुरन्दर मिश्रा ने रक्षाबंधन की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कही।मिश्रा ने कहा कि रक्षा-सूत्र भारतीय सनातन परंपरा में प्रेम, मंगलकामना, सुरक्षा और संकल्प का प्रतीक रहा है। समय के साथ रक्षाबंधन भाई-बहन के स्नेह और अटूट विश्वास का पर्व बनकर जनमानस में विशेष स्थान बना चुका है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चे रिश्ते केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, कर्तव्य, विश्वास और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने की भावना से मजबूत होते हैं।रक्षाबंधन से जुड़ी लोकप्रिय धार्मिक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि एक अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। द्रौपदी के इस सहज स्नेह और आत्मीयता से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा का संकल्प लिया।मिश्रा ने कहा कि लोक-परंपरा में यह प्रसंग निस्वार्थ प्रेम, विश्वास और संकट की घड़ी में अपनों के साथ मजबूती से खड़े रहने की भावना का प्रतीक माना जाता है।उन्होंने कहा कि रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा को इंद्र और इंद्राणी की कथा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर पवित्र रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे संकट से रक्षा, मंगलकामना और विजय के संकल्प के रूप में देखा जाता है।रक्षाबंधन से जुड़ी प्रसिद्ध धार्मिक कथाओं में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी ने राजा बलि को अपना भाई मानकर उन्हें रक्षा-सूत्र बांधा और भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया। राजा बलि ने बहन के स्नेह और सम्मान का आदर करते हुए उनकी इच्छा स्वीकार की।मिश्रा ने कहा कि यह कथा भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के रिश्ते की गरिमा, स्नेह, सम्मान और वचन की महत्ता को रेखांकित करती है।विधायक पुरन्दर मिश्रा ने कहा कि सनातन परंपरा में रक्षा-सूत्र का महत्व केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा है। धार्मिक एवं सामाजिक अवसरों पर गुरु, पुरोहित तथा परिवार के बड़े सदस्य भी मंगलकामना, आशीर्वाद और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में रक्षा-सूत्र बांधते रहे हैं। कालांतर में यह परंपरा भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से विशेष रूप से जुड़ती गई और श्रावण पूर्णिमा का दिन रक्षाबंधन के रूप में व्यापक आस्था एवं उल्लास के साथ मनाया जाने लगा।मिश्रा ने कहा कि आज रक्षाबंधन का अर्थ केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा करने के संकल्प तक सीमित नहीं है। यह पर्व भाई और बहन दोनों को एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने, सम्मान की रक्षा करने, परिवार को प्रेम के सूत्र में बांधे रखने और रिश्तों में विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देता है।उन्होंने कहा कि राखी का पवित्र धागा भले ही छोटा होता है, लेकिन उसमें समाए प्रेम और भावनाओं की शक्ति बहुत बड़ी होती है। यह धागा कलाई पर बंधने के साथ-साथ दिलों को भी जोड़ता है। हमारी सनातन संस्कृति के ऐसे पर्व परिवार और समाज में प्रेम, सद्भाव, संस्कार और एकता को मजबूत करने का कार्य करते हैं।

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