रायपुर : ’विशेष लेख’ : ’कोदो-कुटकी की खेती अपनाएं, पोषण और समृद्धि दोनों पाएं’

PTV BHARAT 24 JUNE 2026- रायपुर : विशेष लेख – कोदो-कुटकी की खेती अपनाएं, पोषण और समृद्धि दोनों पाएं

छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि परंपरा में कोदो और कुटकी का विशेष स्थान रहा है। सदियों से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के भोजन का हिस्सा रहे ये लघु धान्य (मिलेट्स) आज एक बार फिर किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चर्चा के केंद्र में हैं। बदलती जलवायु परिस्थितियों, पोषण संबंधी चुनौतियों और टिकाऊ खेती की आवश्यकता के बीच कोदो और कुटकी भविष्य की कृषि व्यवस्था का मजबूत आधार बनकर उभर रहे हैं।

कोदो (पास्पलम स्क्रोबिकुलेटम) और कुटकी (पैनिकम सुमाट्रेंस) ऐसी फसलें हैं जिन्हें कम पानी, कम लागत और सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये कम उपजाऊ, पथरीली और ढालू भूमि में भी अच्छी पैदावार देती हैं, जहां अन्य फसलें अपेक्षित उत्पादन नहीं दे पातीं। यही कारण है कि ये छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का एक मजबूत माध्यम बन रही हैं।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भी कोदो और कुटकी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कोदो में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आयरन और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जबकि कुटकी फाइबर, प्रोटीन, फास्फोरस और अन्य खनिज तत्वों से भरपूर होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनका नियमित सेवन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और एनीमिया जैसी समस्याओं के नियंत्रण में सहायक हो सकता है। इसी कारण आज इन्हें “सुपर फूड” के रूप में पहचान मिल रही है।

छत्तीसगढ़ सरकार भी मिलेट फसलों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वर्ष 2026 के लिए कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,200 रुपये प्रति क्विंटल तथा कुटकी का 3,350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ इन फसलों की खेती के प्रति उत्साह बढ़ा है।

विभागीय आंकड़ों के अनुसार खरीफ वर्ष 2025 में प्रदेश में कोदो की खेती 39.02 हेक्टेयर तथा कुटकी की खेती 38.03 हेक्टेयर क्षेत्र में की गई थी। इस दौरान कोदो की औसत उत्पादकता 550 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और कुटकी की 675 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। कुल मिलाकर 21.46 टन कोदो और 25.67 टन कुटकी का उत्पादन हुआ।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने भी किसानों से धान के साथ-साथ कोदो, कुटकी और रागी जैसी मिलेट फसलों की खेती बढ़ाने की अपील की है। उनका मानना है कि ये फसलें किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार आधुनिक तकनीकों को अपनाकर कोदो-कुटकी की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। मानसून की शुरुआत के साथ जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक बुवाई, बीजोपचार, कतार पद्धति, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर खरपतवार नियंत्रण जैसे उपाय किसानों को बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।

बढ़ती बाजार मांग, मिलेट आधारित उत्पादों का विस्तार और सरकारी प्रोत्साहन योजनाएं इन फसलों के व्यावसायिक महत्व को लगातार बढ़ा रही हैं। जो फसलें कभी केवल ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित थीं, वे आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी अलग पहचान बना रही हैं।

पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आर्थिक उन्नति के लिए कोदो और कुटकी अत्यंत महत्वपूर्ण फसलें हैं। आवश्यकता इस बात की है कि किसान आधुनिक तकनीकों के साथ इन पारंपरिक फसलों का उत्पादन बढ़ाएं और उपभोक्ता इन्हें अपने दैनिक भोजन का हिस्सा बनाएं। कोदो-कुटकी केवल अनाज नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज, टिकाऊ कृषि और समृद्ध भविष्य की आधारशिला हैं।

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