PTV BHARAT 15 OCTOBER 2026 – छत्तीसगढ़ : शक्तिपीठ परियोजना से पांच प्रमुख धार्मिक स्थलों का होगा विकास, पर्यटन सुविधाओं का होगा विस्तार
छत्तीसगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को मिलेगी नई पहचान
छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्ध संस्कृति और प्राचीन धार्मिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र है। यहां के धार्मिक स्थलों, ऐतिहासिक धरोहरों और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों में देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने की व्यापक संभावनाएं हैं। प्रदेश में लगभग 138 स्थलों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व के आधार पर पर्यटन स्थल के रूप में प्राथमिकता दी गई है। इनमें 58 स्मारक, 11 अभयारण्य और 3 राष्ट्रीय उद्यान संरक्षित घोषित किए गए हैं।
भारतीय परंपरा में अतिथि देवो भवः का विशेष महत्व है। इसी भावना के अनुरूप छत्तीसगढ़ में धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहल की जा रही हैं। राज्य सरकार ने उत्तराखंड के चारधाम की तर्ज पर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों को जोड़ने के उद्देश्य से शक्तिपीठ परियोजना की परिकल्पना की है। इसके अंतर्गत लगभग 1,000 किलोमीटर लंबे आध्यात्मिक एवं धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर का विकास प्रस्तावित है। इसका उद्देश्य प्रमुख शक्तिपीठों का विकास, सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाओं का विस्तार करना है।
पांच प्रमुख शक्तिपीठों को जोड़ने की योजना
छत्तीसगढ़ आस्था पथ यानी शक्तिपीठ भ्रमण योजना के अंतर्गत प्रदेश के पांच प्रमुख धार्मिक स्थलों—मां महामाया मंदिर रतनपुर, मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़, मां चंद्रहासिनी मंदिर चंद्रपुर, मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा और मां बागेश्वरी मंदिर कुदरगढ़—को धार्मिक सर्किट के रूप में विकसित करने की योजना है।
राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में इस योजना के लिए 5 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इन पांचों शक्तिपीठों को बेहतर सड़क संपर्क, यात्री सुविधाओं, विश्राम स्थलों और सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में कार्य प्रस्तावित हैं। छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल और जिला प्रशासन द्वारा मंदिरों में सौंदर्यीकरण तथा श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार के प्रयास किए जा रहे हैं।
मां महामाया मंदिर रतनपुर के विकास के लिए 200 करोड़ की कार्ययोजना
केंद्र सरकार की तीर्थयात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक विरासत संवर्धन अभियान (प्रसाद) योजना के अंतर्गत बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर के समग्र विकास के लिए 200 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार कर केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय को भेजी गई है। कार्ययोजना को स्वीकृति मिलने के बाद एजेंसी निर्धारित कर निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाएगा। इसके अलावा डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा के शक्तिपीठों के लिए भी विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है।
प्रसाद योजना का उद्देश्य देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थस्थलों पर पर्यटन सुविधाओं का विकास करना है, ताकि श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं मिलें तथा इन स्थलों की पहचान का विस्तार हो। छत्तीसगढ़ के प्रमुख देवी मंदिरों को इस योजना से जोड़ने के लिए भी प्रस्ताव तैयार किए गए हैं।
पांचों शक्तिपीठों में विकसित होंगी आधुनिक सुविधाएं
शक्तिपीठ परियोजना के अंतर्गत धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सुविधाएं विकसित करने की योजना है। इनमें उद्यान, ठहरने की व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था, हवन-पूजन स्थल, रेलिंग, पेयजल, सामुदायिक शौचालय, बैठने की व्यवस्था, रोप-वे, पर्यटन मंडल के केंद्र, सीसीटीवी कैमरे, सुरक्षा व्यवस्था और होम स्टे जैसी सुविधाएं शामिल हैं।
इसके साथ ही बेहतर सड़क संपर्क, सुव्यवस्थित पार्किंग, पर्यटक सहायता केंद्र, डिजिटल सूचना प्रणाली और प्राथमिक चिकित्सा जैसी सुविधाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। इन स्थलों के विकास के दौरान स्थानीय वास्तुकला, संस्कृति और प्राकृतिक परिवेश के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।
मां बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ : आस्था का प्रमुख केंद्र
राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में सुरम्य पहाड़ियों पर स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। समुद्र तल से लगभग 1,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मंदिर का इतिहास प्राचीन बताया जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, कामाख्या नगरी के राजा वीरसेन ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव और देवी दुर्गा की आराधना की थी। देवी की कृपा से पुत्र प्राप्त होने के बाद उन्होंने मंदिर की स्थापना कराई।
समय के साथ विभिन्न शासकों ने इस क्षेत्र और मंदिर के विकास में योगदान दिया। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर और आसपास के क्षेत्र में पर्यटन सुविधाओं का विकास होने से श्रद्धालुओं की यात्रा अधिक सुगम बनाने में मदद मिलेगी।
मां महामाया मंदिर, रतनपुर : ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत
बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित मां महामाया मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख ऐतिहासिक शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर का संबंध कलचुरी राजवंश से माना जाता है। प्रचलित विवरणों के अनुसार, मंदिर का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी में कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम के समय हुआ था। मां महामाया को क्षेत्र की आराध्य देवी और कलचुरी राजवंश की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
मंदिर के गर्भगृह में मां महामाया की प्रतिमा स्थापित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का दाहिना हाथ गिरा था। ऐतिहासिक महत्व और श्रद्धालुओं की आस्था के कारण यह मंदिर धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसके समग्र विकास के लिए प्रस्तावित कार्ययोजना से यहां सुविधाओं के विस्तार की उम्मीद है।
मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा : जनजातीय परंपरा और आस्था का संगम
बस्तर अंचल के दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम के निकट स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर धार्मिक आस्था और स्थानीय जनजातीय परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती के दांत गिरे थे, जिसके कारण देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा।
मंदिर की अधिष्ठात्री देवी को बस्तर के काकतीय राजाओं की कुलदेवी माना जाता है। मंदिर में काले पत्थर से निर्मित छह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान इस मंदिर का विशेष महत्व रहता है। इस अवसर पर माता के छत्र और डोली को दंतेवाड़ा से जगदलपुर ले जाया जाता है। इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और जनजातीय समुदाय के लोग शामिल होते हैं। मंदिर का विकास क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
मां बागेश्वरी मंदिर, कुदरगढ़ : पहाड़ियों और जंगलों के बीच आस्था का धाम
सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड में स्थित कुदरगढ़ मंदिर पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां मां बागेश्वरी की पूजा की जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह क्षेत्र मां भगवती पार्वती की तपोस्थली रहा है। मान्यता है कि लगभग चार सौ वर्ष पहले राजा बालंद ने यहां माता की स्थापना की थी।
मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपराओं में बैगा जनजाति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। प्राकृतिक परिवेश से घिरे इस धार्मिक स्थल पर सड़क, सुरक्षा और यात्री सुविधाओं का विकास श्रद्धालुओं के लिए उपयोगी होगा।
मां चंद्रहासिनी मंदिर, चंद्रपुर : महानदी तट पर स्थित सिद्ध शक्तिपीठ
सक्ती जिले के चंद्रपुर में महानदी और मांड नदी के संगम के निकट स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, संबलपुर के राजा चंद्रहास से इस मंदिर का नाम जुड़ा है। वर्ष 1522 में चंद्रपुर के गोंड राजा धुंध्या राम साह अत्राम द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराए जाने का उल्लेख मिलता है। गोंड राजाओं ने मां चंद्रहासिनी को अपनी कुलदेवी माना और शक्ति पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का बायां कान गिरा था। महानदी के निकट स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। मंदिर की स्थापत्य कला और आसपास का प्राकृतिक परिवेश इसे धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
पर्यटन से रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा प्रोत्साहन
शक्तिपीठ परियोजना का उद्देश्य धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी है। पर्यटन स्थलों पर बेहतर सुविधाओं के विकास से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। होटल, परिवहन, भोजन, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों से जुड़ी गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
छत्तीसगढ़ में पर्यटन विकास के माध्यम से राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार करने पर जोर दिया जा रहा है। पर्यटन अधोसंरचना के विकास में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने, पारिस्थितिकी एवं साहसिक पर्यटन जैसी नई अवधारणाओं को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदाय के अधिकारों एवं बौद्धिक संपदा का सम्मान करने पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
पांच प्रमुख शक्तिपीठों को बेहतर संपर्क मार्गों और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने की पहल से छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान को विस्तार मिल सकता है। इससे श्रद्धालुओं की यात्रा सुगम होने के साथ प्रदेश में पर्यटन गतिविधियों और स्थानीय रोजगार की संभावनाओं को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

