PTV BHARAT 22 SEPTMBER 2026 रायपुर। दुनिया भर में तेजी से बढ़ने वाले कैंसरों में लिवर कैंसर भी एक प्रमुख कैंसर बनता जा रहा है। यह बात यशोदा हॉस्पिटल्स, हाईटेक सिटी, हैदराबाद के क्लिनिकल डायरेक्टर, वरिष्ठ सलाहकार मेडिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट एवं लिवर विशेषज्ञ डॉ. नवीन पोलावरपु ने कही।आज raipur में आयोजित एक विशेष मीडिया सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. नवीन पोलावरपु ने लिवर संबंधी बीमारियों के बढ़ते खतरे और समय पर उनकी पहचान के महत्व पर प्रकाश डाला।उन्होंने बताया कि फैटी लिवर, हेपेटाइटिस बी और सी वायरस के संक्रमण तथा अत्यधिक शराब के सेवन के कारण लिवर को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। लिवर को होने वाले नुकसान को ‘साइलेंट किलर’ बताते हुए उन्होंने कहा कि कई लोगों को तब तक अपनी बीमारी का पता नहीं चलता, जब तक पैरों में सूजन, पेट में पानी भरना या तिवर कैंसर जैसे लक्षण सामने नहीं आते। उस समय तक बीमारी के गंभीर अवस्था में पहुंचने का खतरा रहता है।उन्होंने लिवर के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए नियमित रूप से रक्त जांच और अल्ट्रासाउंड स्कैन कराने की सलाह दी। हेपेटाइटिस बी और सी वायरस कई लोगों के शरीर में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के मौजूद रह सकते हैं और धीरे-धीर तिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। समय पर जांच के माध्यम से बीमारी की पहचान करने तथा हेपेटाइटिस बी के टीकाकरण और उचित उपचार से गंभीर जटिलताओं के खतरे को कम किया जा सकता है।उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) वर्ष 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने के लक्ष्य की दिशा में कार्य कर रहा है।फैटी लिवर से बचाव के लिए उन्होंने कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज और थायरॉइड संबंधी समस्याओं को नियंत्रण में रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।उन्होंने चेतावनी दी कि अत्यधिक शराब का सेवन पैक्रियाटाइटिस (अग्न्याशय में सूजन) का कारण बन सकता है, जो गंभीर स्थिति में जानलेवा भी साबित हो सकता है। शराब का सेवन कम करने या पूरी तरह छोड़ने से लिवर और अन्याशय को होने वाले नुकसान से बचाव में मदद मिल सकती है।डॉ. नवीन ने आगे बताया कि अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतों के कारण गैस्ट्रिक और पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। उन्होंने सलाह दी कि यदि मल त्याग की आदतों में बदलाव, मल में खून आना, पेट फूलना या इसी तरह के लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।उन्होंने बताया कि कोलोनोस्कोपी के माध्यम से आंतों में मौजूद पॉलीप्स की शुरुआती अवस्था में पहचान कर उन्हें हटाया जा सकता है, जिससे कई मामलों में कोलोरेक्टल कैंसर को रोका जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि पश्चिमी देशों में कोलोनोस्कोपी के प्रति जागरूकता और जांच में वृद्धि से कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाने में मदद मिली है।
फैटी लिवर और हेपेटाइटिस से बढ़ रहा है कैंसर का खतरा
