रायपुर : बच्चों के लिए भारत के पहले द्विभाषी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का हुआ विमोचन

PTV BHARAT 06 OCTOBER 2026 – रायपुर : बच्चों के लिए भारत के पहले द्विभाषी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का हुआ विमोचन – बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, जिज्ञासा, रचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से रायपुर में 6 और 7 अक्टूबर को विद्यालयीन शिक्षकों के लिए दो दिवसीय ‘कहानीकार’ कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इसमें कला, कहानी और स्थानीय अनुभवों को शिक्षण से जोड़कर बच्चों को प्रकृति एवं पर्यावरण को समझने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

कहानी के जरिए पर्यावरण से जोड़ने पर जोर – आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट, समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़, यूनिसेफ और छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर, रायपुर के संयुक्त सहयोग से आयोजित कार्यशाला की थीम ‘आर्ट ऐज स्टोरी, स्टोरी ऐज नॉलेज, नॉलेज ऐज एक्शन’ रखी गई है। इसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों के शासकीय विद्यालयों के शिक्षक भाग ले रहे हैं।

उद्घाटन अवसर पर छत्तीसगढ़ साइंस सेंटर के महानिदेशक पी. कवीश्वर ने कहा कि कहानी बच्चों को जानकारी देने के साथ अपने आसपास की दुनिया को देखने, समझने और स्वतंत्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने बच्चों को प्रकृति का स्वयं अवलोकन करने, प्रश्न पूछने और अपने अनुभवों को कहानी के रूप में व्यक्त करने के अवसर देने पर जोर दिया।

द्विभाषी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का विमोचन – कार्यशाला के दौरान बच्चों के लिए तैयार भारत के पहले द्विभाषी हिंदी-अंग्रेजी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का विमोचन किया गया। इसे आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट के एक्शन रिसर्च के माध्यम से विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे विषयों को सहज एवं रचनात्मक तरीके से समझने और अपनी बात अभिव्यक्त करने का मंच देना है।

केयर प्रोजेक्ट की प्रोजेक्ट लीड एवं ‘जुगनू’ की पब्लिशर डॉ. शालिनी शर्मा ने बताया कि टैब्लॉइड में देशभर के विद्यालयीन शिक्षकों और बच्चों की कहानियों एवं रचनात्मक सामग्री को स्थान देने की परिकल्पना की गई है। इसमें स्थानीय परिवेश, प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु से जुड़े अनुभवों एवं विचारों को मंच मिलेगा।

उन्होंने कहा कि ‘जुगनू’ का उद्देश्य बच्चों में जलवायु परिवर्तन को लेकर केवल चिंता या भय पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें पर्यावरण को समझने, प्रश्न पूछने, अपनी आवाज व्यक्त करने और सकारात्मक बदलाव के लिए पहल करने हेतु प्रेरित करना है। ‘लेट अस टर्न इको-एंग्जायटी इनटू इको-एजेंसी’ की भावना के साथ यह पहल बच्चों को पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति संवेदनशील और समाधान की दिशा में सक्रिय बनने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

पर्यावरणीय संवेदनशीलता को बचपन से संस्कार का हिस्सा बनाने पर जोर – छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर की सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर प्रज्ञा कदम ने कहा कि कहानी बच्चों के विचारों, संवेदनाओं और दृष्टिकोण को विकसित करने का सशक्त माध्यम है। बचपन से प्रकृति और पर्यावरण को देखने, समझने और उससे जुड़ने के अवसर मिलने पर उनमें पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित हो सकती है।

उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय संवेदनशीलता को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर बच्चों के दैनिक जीवन और संस्कार का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। कहानी, कला और स्थानीय अनुभवों के माध्यम से बच्चों में जिज्ञासा, अवलोकन क्षमता, स्वतंत्र विचार और जिम्मेदारी की भावना विकसित की जा सकती है।

अनुभवात्मक और रचनात्मक शिक्षण के तरीके सीख रहे शिक्षक – कार्यशाला में कला, कहानी और स्थानीय जलवायु अनुभवों पर आधारित गतिविधिपरक सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। शिक्षक स्थानीय परिवेश, प्रकृति, समुदाय और पर्यावरण से जुड़े अनुभवों को कहानी एवं कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं।

कार्यशाला के माध्यम से शिक्षकों को ऐसे रचनात्मक शिक्षण उपकरणों से परिचित कराया जा रहा है, जिनसे वे विद्यार्थियों को स्वयं अवलोकन करने, प्रश्न पूछने, विचार करने, अनुभव साझा करने और समाधान तलाशने के लिए प्रेरित कर सकें। कार्यशाला में विकसित कहानियों और गतिविधियों का आगे कक्षा-कक्ष में शिक्षण-अधिगम संसाधन के रूप में उपयोग किया जा सकेगा।

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