PTV BHARAT 12 OCTOBER 2026 – सरगुजा : मत्स्य पालन से समृद्ध हो रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों और महिलाओं के लिए खुल रहे स्वरोजगार के नए अवसर
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में खेती और पशुपालन के साथ मत्स्य पालन भी आय का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। सरगुजा जिले में शासन की विभिन्न योजनाओं, मत्स्य पालन विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और स्थानीय जल संसाधनों के बेहतर उपयोग से ग्रामीण परिवारों के लिए स्वरोजगार के नए अवसर विकसित हो रहे हैं। कहीं मछुआरा सहकारी समितियों के सदस्य सामूहिक रूप से मछली पालन कर रहे हैं, तो कहीं किसान आजीविका डबरियों में मछली उत्पादन के साथ सब्जी की खेती और सिंचाई का लाभ उठा रहे हैं। वहीं, स्व-सहायता समूहों की महिलाएं अमृत सरोवरों में मत्स्य पालन कर आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने और स्वरोजगार के अवसरों का विस्तार करने के प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अनुदान सहायता और विभागीय मार्गदर्शन से पारंपरिक जलाशयों से लेकर आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक तक मत्स्य पालन की विभिन्न गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल रहा है।
घुनघुट्टा जलाशय बना 381 मछुआरों की आजीविका का आधार
सरगुजा जिले का घुनघुट्टा जलाशय सामूहिक मत्स्य पालन के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को आजीविका उपलब्ध कराने का उदाहरण है। यहां आदिवासी मछुआ सहकारी समिति, कलगसा के 381 सदस्य मत्स्य पालन से जुड़े हैं। समिति को 10 वर्ष की अवधि के लिए जलाशय पट्टे पर उपलब्ध कराया गया है।
समिति के अध्यक्ष राम बिलोच राम के अनुसार, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत मछली बीज के लिए 7 लाख 62 हजार रुपये की अनुदान सहायता मिलती है। इस सहयोग से जलाशय में मत्स्य उत्पादन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है। सहकारी समिति के माध्यम से सामूहिक प्रयासों का लाभ बड़ी संख्या में मछुआरा परिवारों तक पहुंच रहा है।
आजीविका डबरियों से मछली पालन और खेती को दोहरा लाभ
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्मित आजीविका डबरियां जल संरक्षण के साथ अतिरिक्त आय का माध्यम भी बन रही हैं। किसान इनमें वर्षा जल का संचय कर मछली पालन कर रहे हैं और जरूरत के अनुसार पानी का उपयोग सब्जी उत्पादन तथा फसलों की सिंचाई के लिए भी कर रहे हैं।
लखनपुर विकासखंड के किसान शिवबालक ने अपनी आजीविका डबरी में कतला, रोहू, मृगल और ग्रास कार्प प्रजातियों की मछलियों का पालन किया। उन्होंने लगभग दो क्विंटल मछली बेचकर 20 से 25 हजार रुपये की आमदनी प्राप्त की। इसके साथ ही वे डबरी में संचित पानी का उपयोग सब्जी उत्पादन के लिए भी कर रहे हैं।
इसी तरह बतौली विकासखंड के किसान लक्ष्मी प्रसाद ने डबरी में मछली पालन से लगभग एक लाख रुपये की आय अर्जित की है। उन्होंने करीब 20 क्विंटल मछली उत्पादन का आकलन किया है। डबरी के पानी से वे साग-सब्जी और गेहूं की सिंचाई भी करते हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जल संरक्षण की संरचनाओं को आजीविका गतिविधियों से जोड़कर किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
डबरियों में मछली पालन के साथ खेती और बागवानी को बढ़ावा
अम्बिकापुर विकासखंड की जोशमनि एक्का के परिवार ने 2 लाख 99 हजार रुपये की लागत से निर्मित डबरी में मछली पालन शुरू किया है। वहीं, लखनपुर विकासखंड के किसान कनी लाल बड़ा ने अपनी डबरी में 9 किलोग्राम मछली बीज डालकर मत्स्य पालन को सब्जी उत्पादन से जोड़ा है।
ग्राम लोसगी के पहाड़ी कोरवा किसान ठिबुल राम ने भी अपनी आजीविका डबरी का बहुउद्देशीय उपयोग शुरू किया है। उन्होंने डबरी में 17 किलोग्राम मछली बीज डाला है। इसके साथ ही मेड़ों पर अरहर, आम, मुनगा और नींबू के पौधे लगाए हैं। मछली पालन के साथ कृषि और बागवानी गतिविधियों को जोड़ने से उन्हें भविष्य में अतिरिक्त आय मिलने की संभावना है।
अमृत सरोवर में मछली पालन से महिलाओं को मिला स्वरोजगार
सरगुजा जिले में स्व-सहायता समूहों की महिलाएं भी मत्स्य पालन के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। बतौली विकासखंड की ग्राम पंचायत बिरीमकेला में ज्योति स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने अमृत सरोवर में सामूहिक रूप से मछली पालन शुरू किया है।
समूह की सदस्य रजनी चौहान बताती हैं कि महिलाओं ने पहली बार लगभग 15 किलोग्राम मछली बेचकर आमदनी प्राप्त की। शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर समूह ने दोबारा मछली बीज डाला और मत्स्य पालन की गतिविधियों को आगे बढ़ाया।
यह पहल महिलाओं को सामूहिक उद्यमिता से जोड़ने का उदाहरण है। समूह के माध्यम से महिलाएं मछली बीज संचयन, देखभाल, उत्पादन और बिक्री जैसी गतिविधियों में भागीदारी बढ़ा रही हैं। अमृत सरोवर जैसे सामुदायिक जल संसाधनों का आजीविका के लिए उपयोग महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की संभावनाएं बढ़ा रहा है।
बायोफ्लॉक तकनीक से मत्स्य पालन की नई संभावनाएं
पारंपरिक तालाबों और जलाशयों के साथ आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक भी जिले में मत्स्य पालन के नए अवसर उपलब्ध करा रही है। इस तकनीक से सीमित स्थान में नियंत्रित परिस्थितियों के तहत मछली पालन किया जा सकता है।
चंपा मंडल ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 14 लाख रुपये की लागत से बायोफ्लॉक इकाई स्थापित की है। इसके लिए उन्हें 8 लाख 40 हजार रुपये का अनुदान मिला। उनकी इकाई में लगभग चार महीने से मछलियों का पालन किया जा रहा है और वे बिक्री की तैयारी कर रही हैं। उन्हें थोक बाजार में लगभग 120 रुपये प्रति किलोग्राम का भाव मिलने की उम्मीद है। वास्तविक आय उत्पादन, बाजार भाव और संचालन लागत पर निर्भर करेगी।
इसी प्रकार विप्लब हलदर ने मत्स्य पालन विभाग के मार्गदर्शन में बायोफ्लॉक पद्धति अपनाई है। उनकी इकाई में मछलियां अभी बढ़वार की अवस्था में हैं और लगभग तीन महीने बाद बिक्री योग्य होने की उम्मीद है। ये प्रयास दर्शाते हैं कि तकनीकी मार्गदर्शन और योजनागत सहायता से ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक मत्स्य पालन का विस्तार किया जा सकता है।
मछली उत्पादन से लेकर विपणन तक रोजगार की संभावनाएं
मत्स्य पालन केवल मछली उत्पादन और बिक्री तक सीमित नहीं है। इससे मछली बीज संचयन, आहार प्रबंधन, तालाबों की देखभाल, मछली पकड़ने, छंटाई, परिवहन और विपणन जैसी गतिविधियां भी जुड़ी हैं। इनके माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अतिरिक्त अवसर विकसित हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत पात्र हितग्राहियों को निर्धारित प्रावधानों के अनुसार मिलने वाली अनुदान सहायता मत्स्य पालन इकाइयों की स्थापना में सहयोग करती है। इसके साथ गुणवत्तापूर्ण मछली बीज, उचित आहार, जल प्रबंधन, विभागीय प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण हैं। मत्स्य पालन को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए उत्पादन लागत और बिक्री से प्राप्त आय का आकलन जरूरी है, क्योंकि कुल बिक्री राशि और वास्तविक शुद्ध लाभ अलग-अलग होते हैं।
जल संरक्षण और आजीविका का संगम, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर कदम
सरगुजा जिले में मत्स्य पालन से जुड़ी पहलें ग्रामीण विकास की उस दिशा को दर्शाती हैं, जिसमें स्थानीय जल संसाधनों को आजीविका से जोड़ा जा रहा है। घुनघुट्टा जलाशय में 381 मछुआरों की सामूहिक आजीविका, डबरियों में मछली पालन के साथ सिंचाई और सब्जी उत्पादन, अमृत सरोवर में महिलाओं का सामूहिक स्वरोजगार तथा बायोफ्लॉक तकनीक से आधुनिक मत्स्य पालन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
इन गतिविधियों से ग्रामीण परिवारों को पारंपरिक कृषि के अतिरिक्त आय के नए स्रोत विकसित करने का अवसर मिल रहा है। सहकारी समितियों और स्व-सहायता समूहों की भागीदारी से सामूहिक उद्यमिता को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।
सरगुजा की ये पहलें बताती हैं कि शासन की योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और हितग्राहियों की मेहनत के समन्वय से मत्स्य पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, वैज्ञानिक पद्धतियां, प्रशिक्षण और बाजार सुविधाओं का विस्तार किसानों, मछुआरों और महिलाओं के लिए स्वरोजगार तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए अवसर विकसित करने में सहायक होगा।

