बीजापुर : तालाब में पाली मछलियों से शंकर कुडि़यम ने संवारी जिंदगी, मछली पालन से बने आत्मनिर्भरता की मिसाल

PTV BHARAT 24 AUGUST 2026 – बीजापुर : तालाब में पाली मछलियों से शंकर कुडि़यम ने संवारी जिंदगी, मछली पालन से बने आत्मनिर्भरता की मिसाल – बीजापुर जिले के ग्रामीण क्षेत्र के श्री शंकर कुडि़यम ने अपने निजी तालाब में मछली पालन को आय का बेहतर साधन बनाकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। मत्स्य पालन विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और शासकीय योजना के सहयोग से उन्होंने स्थानीय संसाधन को लाभकारी व्यवसाय में बदल दिया।

0.45 हेक्टेयर तालाब में शुरू किया मछली पालन

शंकर कुडि़यम ने अपने 0.45 हेक्टेयर निजी तालाब में मछली पालन शुरू किया। मत्स्य पालन विभाग ने उन्हें तालाब की तैयारी और वैज्ञानिक तरीके से पालन के संबंध में तकनीकी मार्गदर्शन दिया।

मत्स्य पालन प्रसार योजना के तहत उन्हें 50 प्रतिशत अनुदान पर उन्नत मत्स्य बीज और मछली पकड़ने के लिए जाल सामग्री भी उपलब्ध कराई गई। इससे उन्हें कम लागत में व्यवस्थित तरीके से व्यवसाय शुरू करने में मदद मिली।

594 किलो मछली का उत्पादन

वैज्ञानिक पद्धति और उचित प्रबंधन अपनाकर शंकर कुडि़यम ने अपने तालाब से 594 किलोग्राम मछली का उत्पादन प्राप्त किया।

मछली पालन पर उनकी कुल लागत करीब 35 हजार रुपये रही, जबकि बिक्री से उन्होंने 1 लाख 30 हजार 600 रुपये की कुल आय अर्जित की।

इस तरह उन्हें 95 हजार 600 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।

परिवार की आर्थिक स्थिति हुई मजबूत

मछली पालन से हुई अतिरिक्त आय ने शंकर कुडि़यम के परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया। उनके लिए तालाब केवल जलस्रोत नहीं रहा, बल्कि नियमित आय और आत्मनिर्भरता का साधन बन गया।

उनकी सफलता यह दिखाती है कि गांव में उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग, विभागीय मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलकर ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत जरिया बन सकते हैं।

अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा

शंकर कुडि़यम की सफलता से जिले के अन्य किसानों और ग्रामीणों को भी मछली पालन को आजीविका के विकल्प के रूप में अपनाने की प्रेरणा मिल सकती है। कम संसाधनों से शुरू होने वाला यह व्यवसाय उचित तकनीक और प्रबंधन के साथ लाभकारी बन सकता है।

सरकार का प्रयास है कि ग्रामीणों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाकर उन्हें रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। बीजापुर में शंकर कुडि़यम की कहानी इसी प्रयास के जमीनी परिणाम की एक मिसाल है।

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