PTV BHARAT 27 AUGUST 2026 रायपुर छत्तीसगढ़ के कृषि विकास एवं कल्याण मंत्री रामविचार नेताम ने बेंगलुरु स्थित आईसीएआर का प्रमुख बागवानी केन्द्र भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान का अवलोकन किया। मंत्री नेताम ने इस दौरान संस्थान में विकसित की जा रही आधुनिक बागवानी तकनीकों, उन्नत किस्मों, उच्च तकनीक नर्सरी, संरक्षित खेती तथा फल-सब्जियों की उत्पादन एवं प्रसंस्करण तकनीकों की जानकारी ली। उन्होंने इन तकनीकों को छत्तीसगढ़ की स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रदेश में अपनाने तथा किसानों की आय में वृद्धि के लिए उपयोगी संभावनाओं पर संस्थान के विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श किया।आईसीएआर-आईआईएचआर देश का प्रमुख बागवानी अनुसंधान संस्थान है, जहां सब्जियों की उन्नत किस्मों एवं उत्पादन तकनीकों के विकास के साथ-साथ फल, फूल एवं सजावटी फसलें, उच्च तकनीकी नर्सरी, रोपण सामग्री, संरक्षित खेती, पॉलीहाउस, ड्रिप सिंचाई-टपक सिंचाई, उर्वरक सिंचाई, जल प्रबंधन, एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान एवं तकनीकी विकास किया जाता है।अवलोकन के दौरान मंत्री श्री नेताम ने विशेष रूप से ऐसी तकनीकों में रुचि दिखाई, जिनके माध्यम से कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन, गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद और बेहतर बाजार मूल्य प्राप्त कर किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। संस्थान में विकसित आधुनिक नर्सरी तकनीक, संरक्षित खेती, जल एवं उर्वरक प्रबंधन तथा कीट-रोगों के एकीकृत नियंत्रण की तकनीकों को छत्तीसगढ़ के किसानों तक पहुंचाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।मंत्री नेताम ने कहा कि छत्तीसगढ़ में बागवानी क्षेत्र के विस्तार और किसानों की आय में वृद्धि की व्यापक संभावनाएं हैं। राज्य में विभिन्न प्रकार की जलवायु एवं कृषि परिस्थितियां उपलब्ध हैं, जिनका बेहतर उपयोग आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती के माध्यम से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी की उन्नत तकनीकों से जोड़कर उत्पादन, उत्पादकता और आय में वृद्धि की दिशा में ठोस प्रयास किए जाएंगे।अपने साथ ले जाने का आग्रह किया। राजा बलि ने बहन के स्नेह और सम्मान का आदर करते हुए उनकी इच्छा स्वीकार की।मिश्रा ने कहा कि यह कथा भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के रिश्ते की गरिमा, स्नेह, सम्मान और वचन की महत्ता को रेखांकित करती है।विधायक पुरन्दर मिश्रा ने कहा कि सनातन परंपरा में रक्षा-सूत्र का महत्व केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा है। धार्मिक एवं सामाजिक अवसरों पर गुरु, पुरोहित तथा परिवार के बड़े सदस्य भी मंगलकामना, आशीर्वाद और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में रक्षा-सूत्र बांधते रहे हैं। कालांतर में यह परंपरा भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से विशेष रूप से जुड़ती गई और श्रावण पूर्णिमा का दिन रक्षाबंधन के रूप में व्यापक आस्था एवं उल्लास के साथ मनाया जाने लगा।मिश्रा ने कहा कि आज रक्षाबंधन का अर्थ केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा करने के संकल्प तक सीमित नहीं है। यह पर्व भाई और बहन दोनों को एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने, सम्मान की रक्षा करने, परिवार को प्रेम के सूत्र में बांधे रखने और रिश्तों में विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देता है।उन्होंने कहा कि राखी का पवित्र धागा भले ही छोटा होता है, लेकिन उसमें समाए प्रेम और भावनाओं की शक्ति बहुत बड़ी होती है। यह धागा कलाई पर बंधने के साथ-साथ दिलों को भी जोड़ता है। हमारी सनातन संस्कृति के ऐसे पर्व परिवार और समाज में प्रेम, सद्भाव, संस्कार और एकता को मजबूत करने का कार्य करते हैं।
कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने आईसीएआर-आईआईएचआर बेंगलुरु का किया अवलोकन, प्रदेश में उन्नत तकनीकों को अपनाने पर विमर्श
