PTV BHARAT 19 AUGUST 2026 – रायपुर : नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, कृषि और समृद्धि की जीवनधारा हैं। छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ बनाने में प्रदेश की जीवनदायिनी नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण सभी की साझा जिम्मेदारी है।
मुख्यमंत्री ने राजधानी रायपुर के ओमाया गार्डन में आयोजित ‘स्रोत महोत्सव 2026’ एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला का दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया। कार्यशाला में नदियों के उद्गम स्थलों एवं कैचमेंट एरिया की पहचान और संरक्षण, जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण तथा नदी संरक्षण को जन अभियान बनाने पर विशेषज्ञों और अधिकारियों ने मंथन किया।
नदी संरक्षण के लिए पांच प्रमुख स्तंभ
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में नदी संरक्षण अभियान को मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण, जनभागीदारी और कार्ययोजना के पांच प्रमुख स्तंभों पर आगे बढ़ाया जाएगा।
प्रत्येक नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्रण किया जाएगा। नदी के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र, भू-उपयोग में बदलाव और प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाले कारणों का अध्ययन किया जाएगा। इसके आधार पर वन एवं वनस्पति संरक्षण, मृदा क्षरण रोकने, पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण एवं पुनर्जीवन, नई जल संग्रहण संरचनाओं और भू-जल पुनर्भरण के उपाय किए जाएंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षाजल नदी और भू-जल दोनों का मूल आधार है। बारिश के पानी को तेजी से बहकर निकलने देने के बजाय अधिक से अधिक मात्रा में जमीन के भीतर पहुंचाना होगा, ताकि भू-जल स्तर सुधरे, जलस्रोत पुनर्जीवित हों और नदियों में लंबे समय तक जल प्रवाह बना रहे।
नदी संरक्षण को जन आंदोलन बनाने पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि जल संरक्षण का लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से हासिल नहीं किया जा सकता। नदी किनारे बसे गांवों और स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों का प्रमुख भागीदार बनाना होगा।
उन्होंने जिला स्तरीय समितियों को पंचायतों के सहयोग से स्थानीय समितियां गठित करने और नदी संरक्षण तथा पुनरुद्धार के कार्य आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। साथ ही विशेषज्ञों से वैज्ञानिक और तकनीकी जानकारी को सरल भाषा में आम लोगों तक पहुंचाने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि मानव सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है। इसलिए आने वाली पीढ़ियों के लिए नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखना समाज की जिम्मेदारी है।
जल संरक्षण के लिए दो महत्वपूर्ण एमओयू
कार्यक्रम में जल संरक्षण की संस्थागत और तकनीकी क्षमता मजबूत करने के लिए दो एमओयू किए गए।
नेशनल वाटर एकेडमी, पुणे के साथ हुए एमओयू के जरिए जल संरक्षण एवं जल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों और मैदानी अमले के प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
वहीं एंट्रिक्स कॉरपोरेशन, बेंगलुरु के साथ हुए एमओयू के माध्यम से इसरो की विशेषज्ञता और आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों का उपयोग जल संसाधनों के वैज्ञानिक विश्लेषण और निगरानी में किया जाएगा। प्रारंभिक चरण में कुनकुरी तहसील के लगभग 1,540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में उन्नत भू-स्थानिक तकनीक से जल संसाधनों की स्थिति का अध्ययन और विश्लेषण किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आधुनिक तकनीक से प्राप्त आंकड़ों को स्थानीय अनुभव और पारंपरिक ज्ञान से जोड़कर क्षेत्र विशेष के अनुरूप अधिक प्रभावी जल संरक्षण योजनाएं तैयार की जा सकती हैं।
‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कार्यक्रम में जल संरक्षण पर आधारित ‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन भी किया। पुस्तक में जल प्रबंधन एवं जल संरक्षण से जुड़े अनुभवों, प्रयासों और नवाचारों का दस्तावेजीकरण किया गया है तथा जलस्रोतों के संरक्षण में महिलाओं की भागीदारी को भी रेखांकित किया गया है।
वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर जोर
सीगंगा के संस्थापक एवं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे ने कहा कि जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नदियों के उद्गम और उन्हें पोषित करने वाले जल स्रोतों की पहचान एवं संरक्षण जरूरी है। वर्षाजल के तेज बहाव को नियंत्रित कर उसे अधिक से अधिक मात्रा में जमीन के भीतर पहुंचाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान, स्थानीय अनुभव और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच समन्वय से ही जलस्रोतों के दीर्घकालिक संरक्षण की प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जा सकती है।
नदी संरक्षण के लिए साइट-स्पेसिफिक समाधान होंगे तैयार
जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो ने कहा कि ‘स्रोत महोत्सव 2026’ का उद्देश्य नदियों के उद्गम और कैचमेंट क्षेत्र के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक, व्यवहारिक और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करना है।
उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण के लिए केवल डाउनस्ट्रीम प्रवाह का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। सोर्स एरिया, भूमि उपयोग, मिट्टी की नमी, भू-जल रिचार्ज, वनस्पति और मृदा क्षरण सहित पूरे नदी पारिस्थितिकी तंत्र को समझना आवश्यक है।
कार्यशाला में नौ नदी समूहों पर अलग-अलग चर्चा की जा रही है और क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप साइंस-बेस्ड एवं साइट-स्पेसिफिक समाधान तैयार किए जा रहे हैं। इनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी और परिणामों के आकलन की समय-सीमा निर्धारित करने पर भी जोर दिया गया।
कार्यशाला में सीगंगा के संस्थापक एवं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे, नमामि गंगे मिशन से जुड़े विशेषज्ञ, एनआईटी रायपुर के प्राध्यापक, राज्य एवं जिला स्तरीय समितियों के सदस्य, विभिन्न जिलों के कलेक्टर एवं अधिकारी तथा जल और नदी संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

