एमसीबी : जलाशय से समृद्धि तक का सफर, 54 केजो ने बदली मछुआ समिति की तस्वी

PTV BHARAT 19 AUGUST 2026 – एमसीबी : जलाशय से समृद्धि तक का सफर, 54 केजों ने बदली मछुआ समिति की तस्वीर – ग्राम शंकरगढ़ का 10.70 हेक्टेयर जलाशय अब ग्रामीण आजीविका, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार बन रहा है। ब्लू-लाइन मछुआ सहकारी समिति मर्यादित, मनेंद्रगढ़ ने पारंपरिक मत्स्य पालन से आगे बढ़कर आधुनिक केज कल्चर तकनीक अपनाकर जलाशय की क्षमता को आय के स्थायी स्रोत में बदल दिया है।

समिति के अध्यक्ष संतोष मांझी के नेतृत्व में 23 सदस्यीय समिति ने मत्स्य विभाग के सहयोग और तकनीकी मार्गदर्शन से वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत जलाशय में 54 केज स्थापित किए। इनमें मोनोसेक्स तिलापिया और पंगाशियस का वैज्ञानिक तरीके से पालन किया जा रहा है।

पारंपरिक मत्स्य पालन से आधुनिक तकनीक तक

ब्लू-लाइन मछुआ सहकारी समिति का पंजीयन 29 अक्टूबर 2021 को हुआ था। समिति ने शंकरगढ़ के जलाशय को लीज पर लेकर पारंपरिक तरीके से मत्स्य पालन शुरू किया, लेकिन उत्पादन सीमित रहने के कारण उपलब्ध जल संसाधन का बेहतर उपयोग करने के लिए आधुनिक केज कल्चर तकनीक अपनाने का निर्णय लिया।

मत्स्य विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के सहयोग से 54 केज स्थापित किए गए। इसके बाद मत्स्य बीज, आहार, स्वास्थ्य, वृद्धि और जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी शुरू की गई।

54 केजों से 30 से 40 टन मछली उत्पादन

वर्तमान में 54 केजों में मोनोसेक्स तिलापिया और पंगाशियस का पालन किया जा रहा है। गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज, संतुलित एवं प्रोटीन युक्त आहार तथा नियमित स्वास्थ्य निगरानी को उत्पादन का आधार बनाया गया है।

मछलियों की उम्र, आकार और वृद्धि के अनुसार आहार की मात्रा तय की जाती है। केजों की नियमित देखभाल, जल गुणवत्ता की जांच और मछलियों के स्वास्थ्य की निगरानी से उत्पादन प्रक्रिया को व्यवस्थित रखा जा रहा है।

वैज्ञानिक प्रबंधन का परिणाम है कि समिति को वर्तमान में करीब 30 से 40 टन मछली उत्पादन प्राप्त हो रहा है।

50 लाख रुपये तक की आय, 8 से 12 लाख रुपये का शुद्ध लाभ

समिति को मछलियों की बिक्री से बेहतर बाजार मूल्य मिलने पर लगभग 45 से 50 लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है। इसमें करीब 30 से 35 लाख रुपये चारा, 2 से 3 लाख रुपये मत्स्य बीज, 4 से 5 लाख रुपये मजदूरी तथा 1 से 2 लाख रुपये दवाइयों और अन्य प्रबंधन कार्यों पर खर्च होते हैं।

प्रमुख खर्चों के बाद समिति को लगभग 8 से 12 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। इसका सीधा लाभ 23 सदस्यों को मिल रहा है और प्रत्येक सदस्य को करीब 34 हजार से 52 हजार रुपये तक लाभांश प्राप्त हो रहा है।

मछली पालन से गांव में बढ़ा रोजगार

केजों की देखभाल, मछलियों को आहार देने, स्वास्थ्य एवं वृद्धि की निगरानी, मछली निकालने, छंटाई, परिवहन और बाजार तक पहुंचाने जैसे कार्यों में 20 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

इस तरह जलाशय से बाजार तक विकसित हुई आर्थिक गतिविधियों ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। मत्स्य पालन अब केवल पारंपरिक आजीविका नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाली संगठित गतिविधि बन गया है।

तकनीकी प्रशिक्षण से मिली नई दिशा

समिति की सफलता में मत्स्य विभाग का तकनीकी मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहा। केज स्थापना से लेकर मत्स्य बीज संचयन, आहार प्रबंधन, जल गुणवत्ता, मछलियों के स्वास्थ्य और उत्पादन प्रक्रिया तक विभाग द्वारा आवश्यक सहयोग दिया गया।

समिति के सदस्यों ने प्रशिक्षण के माध्यम से वैज्ञानिक मत्स्य पालन की बारीकियां सीखीं और उन्हें दैनिक कार्यों में अपनाया। इससे मछलियों की वृद्धि और स्वास्थ्य के अनुसार बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिली।

सहकारिता बनी आत्मनिर्भरता का आधार

ब्लू-लाइन मछुआ सहकारी समिति की सफलता केवल उत्पादन और आय बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक संसाधन, आधुनिक तकनीक, सरकारी सहयोग और सामूहिक प्रयास के बेहतर समन्वय का उदाहरण भी है।

अध्यक्ष संतोष मांझी और समिति के 23 सदस्यों ने उपलब्ध जल संसाधन की क्षमता को पहचाना और उसे आर्थिक अवसर में बदला। आज यही जलाशय समिति के सदस्यों की आय बढ़ाने के साथ आसपास के ग्रामीणों को रोजगार भी उपलब्ध करा रहा है।

ग्राम शंकरगढ़ का 10.70 हेक्टेयर जलाशय अब 54 केजों के माध्यम से 30 से 40 टन मछली उत्पादन, 45 से 50 लाख रुपये तक की आय और 8 से 12 लाख रुपये तक के शुद्ध लाभ का आधार बन चुका है। समिति अब केज आधारित मत्स्य पालन का विस्तार करने, उत्पादन बढ़ाने और अधिक स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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